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[सैमुअल हटिंगटन और] ईराक में अमेरिकी उद्देश्य
द्वारा डैनियल पाइप्स
New York Sun
27 अप्रैल, 2004
मौलिक अंग्रेजी सामग्री: [Samuel Huntington and] American Purposes In Iraq
हिन्दी अनुवाद - अमिताभ त्रिपाठी
ईराक में अमेरिका का उद्देश्य क्या होना चाहिये ? इस बिन्दु पर अमेरिकी सरकार पूरी तरह स्पष्ट है. उसके अनुसार मुक्त और शान्तिपूर्ण ईराक मध्यपूर्व की स्थिरता के लिये आवश्यक है जो बदले में अमेरिका के लोगों की सुरक्षा के लिये आवश्यक है.
एक मुक्त और शान्तिपूर्ण ईराक अमेरिका की दृष्टि में है जो लोकतान्त्रिक, उदार, पूँजीवादी और कानून के शासन के अधीन हो. इस दृष्टि से पूरी सहानुभूति रखते हुये ऐसा कौन हो सकता है जो इससे सहमत न हो. मुझे दोनों बातों की चिन्ता है. ईराकी अमेरिकी दिशा निर्देशों का स्वागत नहीं करेंगे और अन्तत: अमेरिका के सम्बन्ध में पाली गई ये महत्वाकांक्षा वास्तविकता से परे है.
दूसरी चिन्ता के सम्बन्ध में मेरे विचारों को सैमुअल पी. हटिंगटन ने मई में प्रस्तावित अपनी उल्लेखनीय पुस्तक, Who Are We: The Challenges to America's National Identity में स्पष्ट किया है. इस पुस्तक में हार्वर्ड प्रोफेसर ने आप्रवास, द्विभाषावाद, बहुसंस्कृतिवाद, नागरिकता के मूल्यों में आई गिरावट और अमेरिकी कुलीन वर्ग के अराष्ट्रवादी दृष्टिकोण के कारण अमेरिका पर दूसरी संस्कृतियों के प्रभाव का विश्लेषण किया है. वे इस बात का तीव्र आग्रह करते हैं कि इन चुनौतियों के समक्ष मुख्य अमेरिकी मूल्यो पर अधिक जोर दिया जाना चाहिये.
हटिंगटन का विश्लेषण है कि इस मार्ग पर अमेरिकी बाहरी विश्व के साथ अपने सम्बन्धों के लिये तीन व्यापक दृष्टिकोण में से कोई मार्ग चुन सकते हैं-
विविधता- अमेरिका विश्व का, इसके विचारों का, इसके सामानों का और अत्यन्त महत्वपूर्ण इसके लोगों का स्वागत करता है. इस दृष्टिकोण के अन्तर्गत देश बहु राष्ट्रीयता वाला, बहु नस्ली और बहुसंस्कृति वाला बनने का कठोर प्रयास करता है. संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठन धीरे-धीरे अमेरिकी जीवन को प्रभावित कर रहे हैं. विविधता अपने आप में एक अन्त है, राष्ट्रीय पहचान का महत्व क्षीण होता जाता है. संक्षेप में विश्व अमेरिका को नया स्वरूप दे.
साम्राज्यवादी- अमेरिका विश्व को नया स्वरूप दे. इस प्रेरणा को अमेरिकी शक्ति और अमेरिकी मूल्यों की वैश्विकता की धारणा से बल मिलता है. अमेरिका की अनूठी सैन्य शक्ति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के कारण इस पर दायित्व है कि वह बुराई से संघर्ष कर विश्व को व्यवस्थित करे. अन्य व्यक्तियों के सम्बन्ध में भी कल्पना की जाती है कि वे मूलत: अमेरिकी मूल्यों के साथ हैं और अमेरिका के लोगों को उन मूल्यों को प्राप्त करने में सहायता करनी चाहिये. अमेरिका एक राष्ट्र कम पराराष्ट्रीय साम्राज्य का प्रमुख घटक है.
राष्ट्रीय- ‘अमेरिका कुछ भिन्न है’ और इसके लोगों को मानना चाहिये कि वह क्या है जो उन्हें लोगों से अलग करता है. यह भिन्नता बहुत बड़ी मात्रा में देश की धार्मिक प्रतिबद्धता और इसके एंग्लो-प्रोटेस्टेन्ट संस्कृति के कारण है. राष्ट्रीय धारणा उन गुणों का संरक्षण और संवर्धन करती है जिन्होंने आरम्भ से अमेरिका को परिभाषित किया है. जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है जो श्वेत एंग्लो सैक्सन प्रोटेस्टेन्ट नहीं हैं वे भी इसकी एंग्लो प्रोटेस्टेन्ट संस्कृति और राजनीतिक मूल्यों को स्वीकार कर अमेरिकी बने हैं.
हटिंगटन इन तीनों विकल्पों के साथ समापन करते हुये कहते हैं, “ अमेरिका विश्व बनता है, विश्व अमेरिका बन जाता है . अमेरिका अमेरिका ही रहता है”
वामपंथी विविधतावादी दृष्टि की ओर झुकते हैं तथा दक्षिणपंथी साम्राज्यवादी और राष्ट्रवादी के मध्य विभाजित हो जाते हैं. व्यक्तिगत रूप से मैं अन्तिम दोनों के सम्बन्ध में अनिर्णयपूर्ण स्थिति में हूँ- कुछ अवसरों पर चाहता हूँ कि अमेरिका मानवतावादी राजनीतिक सन्देश का निर्यात करे और कुछ अवसरों पर भयभीत होता हूँ कि ऐसे प्रयास यद्यपि आवश्यक हैं फिर भी अमेरिका की पहुँच से बाहर होकर घातक रूप से समाप्त हो जायेंगे.
इन्हीं विकल्पों के साथ हम ईराक की ओर लौटते हैं-
विविधतावादी ईराकी अभियान के एकतरफावाद को अस्वीकार करते हुये ईराक को मुक्त और शान्तिपूर्ण देश के रूप में दिशा निर्देशित करने की धारणा का विरोध करते हैं और बुश प्रशासन के आशय पर गम्भीर सन्देह प्रकट करते हैं. वे गालियों की जबान में प्रदर्शन करते हैं और टेलीविजन स्टूडियो से गालियों की बौछार करते हैं.
साम्राज्यवादी ईराक की ओर अमेरिका की नीतियों को चला रहे हैं जहाँ वे न केवल उस देश का पुनर्वास करने का अवसर देख रहे हैं वरन् मध्य पूर्व में अमेरिका के मार्ग के प्रचार का अवसर भी देख रहे हैं.
और राष्ट्रवादी सदैव की भाँति स्वयं को कहीं इनके मध्य पाते हैं. साम्राज्यवादी दृष्टि के प्रति उनकी सहानुभूति तो है परन्तु उसके परिणामों और चलन को लेकर चिन्ता है. देशभक्तों की भाँति अमेरिका की सफलता पर उन्हें भी गर्व होता है और आशा करते हैं कि अमेरिका प्रभावी हो और विस्तृत हो. परन्तु उनकी दो चिन्तायें हैं- बाहरी विश्व अमेरिका के रंग में रंगने को तैयार नहीं है तथा अमेरिका के लोग साम्राज्यवादी अभियान के लिये अपना धन और रक्त बहाने के इच्छुक नहीं हैं.
हटिंगटन स्पष्ट रूप से राष्ट्रवादी हैं और मैं कम स्पष्ट रूप से . मेरा मानना है कि ईराक में अमेरिका का उद्देश्य अमेरिकी हितों की रक्षा तक सीमित होना चाहिये. मेरी आशा है कि सद्दाम हुसैन के अपदस्थ होने से ईराकी जनता को लाभ पहुँचा है और वे नई शुरूआत कर सकते हैं परन्तु मैं ईराक को इस रूप में पुनर्वासित करने को अस्वीकार करता हूँ जहाँ से हम अमेरिकी उपक्रम की परीक्षा कर सकें.
अमेरिका की सैन्य मशीन सामाजिक कार्य का उपकरण नहीं है और न ही विश्व की नई रचना का. इसके बजाय इसका प्राथमिक कार्य यह है कि यह अमेरिका को बाहरी खतरों से सुरक्षित रख सके. अमेरिका का उद्देश्य मुक्त ईराक नहीं वरन् ऐसा ईराक हो सकता है जो अमेरिका के लिये खतरा न हो.
सम्बन्धित विषय: अमेरिका की विदेश नीति, ईराक
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