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[यू.एन.आर.डब्ल्यू.ए] शरणार्थी अभिशाप

द्वारा डैनियल पाइप्स
न्यूयार्क पोस्ट
19 अगस्त, 2003

मौलिक अंग्रेजी सामग्री: [UNRWA:] The Refugee Curse
हिन्दी अनुवाद - अमिताभ त्रिपाठी

यहाँ एक उलझन है। फिलीस्तीनी किस प्रकार 20वीं शताब्दी के 135 मिलियन शरणार्थियों से भिन्न हैं।

उत्तर- और अन्य उदाहरणों में कब्जे से बाहर होने, राज्यहीनता और गरीबी समय के साथ कम होती गई। शरणार्थी या तो कहीं और बस गये, घर लौट गये या मर गये। उनकी सन्तानें चाहे दक्षिण कोरिया,वियतनाम, पाकिस्तान, इजरायल, तुर्की, जर्मनी या फिर अमेरिका में हों उन्होंने या तो अपना शरणार्थी स्तर समाप्त कर दिया और मुख्यधारा में शामिल हो गये। फिलीस्तीनियों के साथ ऐसा नहीं है। उनके लिये शरणार्थी श्रेणी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जारी है जिससे क्रोध और कुण्ठा का बड़ा स्वरूप तैयार होता है।

इस विषमता की ब्याख्या अनेक तत्व करते हैं परन्तु उनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व संयुक्त राष्ट्र संघ का अफसरशाही ढाँचा है। शरणार्थी मामलों को लेकर इसके पास दो संगठन हैं जिनकी शरणार्थियों के सम्बन्ध में अपनी परिभाषा है।

शरणार्थियों के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ उच्चायुक्त- यह वाक्यांश अधिकतर उन लोगों पर लागू होता है जो उत्पीड़न के भय से ग्रस्त हैं या अपने देश की राष्ट्रीयता से बाहर हैं। देश की राष्ट्रीयता से बाहर होने का अर्थ है कि शरणार्थी के वंशज शरणार्थी नहीं हैं। क्यूबा के जो लोग कास्त्रो के शासन से भागे थे वे शरणार्थी हैं परन्तु फ्लोरिडा में जन्मे उनके बच्चे शरणार्थी नहीं हैं । अफगानिस्तान से भागे लोग शरणार्थी हैं परन्तु ईरान में जन्मे उनके बच्चे शरणार्थी नहीं हैं। इसी प्रकार और भी उदाहरण हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता और कार्य एजेन्सी- 1949 में फिलीस्तीनी शरणार्थियों के लिये निर्मित अभूतपूर्व संगठन जो फिलीस्तीनी शरणार्थियों की परिभाषा अन्य परिभाषाओं से भिन्न है। वे ऐसे लोग हैं जो जून 1946 से मई 1948 के मध्य फिलीस्तीन में रहते थे और 1948 के अरब-इजरायल संघर्ष में उन्हें अपना घर और आजीविका दोनों से हाथ धोना पड़ा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संगठन शरणार्थी स्तर 1948 में शरणार्थी बने लोगों के वंशजों को भी प्रदान करता है। यह केवल एक फिलीस्तीनी अभिभावक के बच्चे को भी शरणार्थी का दर्जा देता है।

उच्चायुक्त की परिभाषा शरणार्थी जनसंख्या को एक बार में ही समाप्त कर देती है। जबकि संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी उसे बिना सीमा के आगे बढ़ाती है। चलिये 1948 के फिलीस्तीनी शरणार्थियों की प्रत्येक परिभाषा को देखें जो संयुक्त राष्ट्र की गणना के अनुसार 7लाख 26 हजार है। ( विद्वानों की राय में यह गणना 4 लाख 20 हजार से 5 लाख 39 हजार के मध्य कहीं है)

संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त की परिभाषा के अनुसार शरणार्थी स्तर 7 लाख 26 हजार अभी जीवित लोगों को ही प्राप्त होता है। एक भूजनांकिकी विशेषज्ञ के अनुसार 1948 के उन शरणार्थियों में 2 लाख के आस-पास ही लोग आज जीवित हैं।

संयुक्त राष्ट्र सहायता और कार्य एजेन्सी की गणना में शरणार्थियों के बच्चे, पोते, परपोते और वे फिलीस्तीनी भी आते हैं जिन्होंने 1967 में अपना घर छोड़ा और इस प्रकार शरणार्थी 40 लाख 25 हजार हैं। वैश्विक परिभाषा के अनुसार 2 लाख शरणार्थी 40 लाख 25 हजार शरणार्थियों की संख्या का मात्र 5 प्रतिशत हैं। अन्तर्राष्ट्रीय मानदण्डों के अनुसार शेष 95 प्रतिशत किसी भी प्रकार शरणार्थी नहीं हैं। जो फिलीस्तीनी कभी भी कहीं नहीं गये उन्हें गलत ढंग से शरणार्थी स्तर देकर संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी रचनात्मक और औद्योगिक लोगों को निकाले जाने, आत्म दया और उपयोग हीन के रूप में निन्दित किया है। उसके बाद अरब सरकारों की योजनायें स्थिति को और बिगाड़ रही हैं जब वे फिलीस्तीनियों को शरणार्थी स्तर में बैठा देती हैं। उदाहरण के लिये लेबनान में 4 लाख राज्यहीन शरणार्थियों को पब्लिक स्कूल में जाने की अनुमति नहीं है तथा स्वामित्व या घर की सम्पत्ति को ठीक करने का अधिकार नहीं है।

यह उचित समय है जब गैर शरणार्थी पीढ़ी की सहायता की जाये ताकि वे शरणार्थी स्तर से निकलकर नागरिक बन सकें, उत्तरदायित्व की कल्पना कर भविष्य का निर्माण कर सकें। उनके लिये सबसे अच्छा होगा कि संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी अपने दरवाजे बन्द करे और संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त फिलीस्तीनी शरणार्थियों की टिमटिमाती संख्या को आत्मसात करे। ऐसा तभी होगा जब अमेरिकी सरकार फिलीस्तीनियों के कष्ट को शाश्वत बनाने में संयुक्त राष्ट्र एजेन्सी की भूमिका को स्वीकार करे। फिलीस्तीनी शरणार्थियों के कल्याण के प्रति गहरी प्रतिबद्धता की दिग्भ्रमित भावना में वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी के 360 मिलियन डालर के वार्षिक बजट का 40.प्रतिशत वाशिंगटन उपलब्ध कराता है, इसे शून्य किये जाने की आवश्यकता है।

सौभाग्य से अमेरिकी कांग्रेस इस सम्बन्ध में जागरूक हो रही है। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की समिति के रिपब्लिकन पार्टी के सांसद क्रिस स्मिथ ने हाल ही में महा अंकेक्षण विभाग की जाँच को संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी के सम्बन्ध में अमेरिका की सहायता तक विस्तृत करने को कहा। उसी समिति में उच्च श्रेणी के डेमोक्रेट सदस्य टाम लान्टोस इससे भी आगे गये। फिलीस्तीनी शरणार्थियों के मामले में विशेषाधिकार और लम्बे रूप की आलोचना करते हुये उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी को बन्द करने और उसका दायित्व उच्चायुक्त को सौंपने का आह्वान किया।

अन्य पश्चिमी सरकारों को वाशिंगटन के साथ मिलकर फिलीस्तीनी शरणार्थियों की समस्या का समाधान करने के संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी के नवीनीकरण की आगामी बैठक जून 2005 में इसके अधिकार को निलम्बित करने के लिये एक साथ आना चाहिए। अब समय आ गया है जब खराब छवि के संगठनों को नष्ट करने के लिये जमीनी स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है और इनकी शरारती परिभाषाओं को और इनके कार्य को भी।

संयुक्त राष्ट्र एजेन्सी के केन्द्रीय कार्यालय गाजा से जन सूचना अधिकारी पाल मैकन का न्यूयार्क पोस्ट में 26 अगस्त को छपा जवाब – यह अत्यन्त कष्ट का विषय है कि हमने संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी और फिलीस्तीनी शरणार्थियों के सम्बन्ध में डैनियल पाइप्स का स्तम्भ पढ़ा। यद्यपि पाइप्स अपने विचार के लिये स्वतन्त्र हैं परन्तु उनके लेख में अनेक बिन्दु भ्रामक थे।

फिलीस्तीनी शरणार्थी अन्य शरणार्थियों से भिन्न हैं क्योंकि उनमें से बहुसंख्यक कब्जे से बाहर और राज्यहीनता की दशा से गुजर रहे हैं। उनके आक्रोश और कुण्ठा का कारण उनका शरणार्थी स्तर नहीं वरन् उनका कब्जे से बाहर होना और उनकी राज्य हीनता की स्थिति है।

संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी की शिक्षा, स्वास्थ्य, सहायता और सामाजिक सेवा ने फिलीस्तीनी शरणार्थियों में मानवीय सम्भावनायें विकसित की हैं। ताकि वे जिस समाज में रहते हैं उसमें आत्मनिर्भर हो सकें। स्वनिर्वासित, आत्मदया और उपयोगहीन के रूप में फिलीस्तीनी शरणार्थियों के निन्दित होने का कारण संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी नहीं वरन् शरणार्थी समस्या का समाधान न कर पाने की विभिन्न पक्षों की अक्षमता है। इसलिये संयुक्त राष्ट्र एजेन्सी को नष्ट करने से शरणार्थी समस्या का समाधान नहीं होगा जैसा कि पाइप्स का दावा है। शरणार्थी और उनकी दशा वैसी ही रहेगी। संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी को शरणार्थी समस्या के समाधान का जनादेश प्राप्त नहीं है। यह विषय तो संघर्ष में शामिल विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित राजनीतिक प्रश्न है।

इजरायल सहित अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय ने इस क्षेत्र में स्थिरता के लिये संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेन्सी की भूमिका की प्रशंसा की है। संयुक्त राष्ट्र एजेन्सी को खराब छवि का संस्थान और इसके मानवीय कार्य को दुष्ट कार्य की संज्ञा देकर पाइप्स ने पूर्वाग्रह पूर्ण विचारों की सीमा का उल्लंघन किया है।

सम्बन्धित विषय: अरब इजारायल संघर्ष और कूटनीति, फिलीस्तीनी

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