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एन.आई.ई ने ईरान के साथ युद्ध अवश्यंभावी बना दिया है।
द्वारा डैनियल पाइप्स
जेरूसलम पोस्ट
13 दिसंबर, 2007
मौलिक अंग्रेजी सामग्री: That NIE Makes War against Iran More Likely
हिन्दी अनुवाद - अमिताभ त्रिपाठी
अभी हाल ही में अमेरिका की कुछ खुफिया एजेंसिंयो द्वारा तैयार की गयी राष्ट्रीय खुफिया आकलन को दिसम्बर 3 को दुनियां के सामने पेश किया गया। “ईरान परमाणविक आकांक्षाए और क्षमता नामक इस की रिपोर्ट पर कुछ इस तरह की आम सहमति बन रही है कि इसने ईरान के खिलाफ युद्ध की नीति को लगभग एजेंडें से बाहर कर दिया है। यहाँ तक कि ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमेदीनेजाद ने तो इसे देश के दुश्मनों के लिए एक “गहरे धक्के ” संज्ञा दे डाली और उन्हीं के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने इसे एक बड़ी जीत ” कहा ।
पर मैं अपने आपको इस तथाकथित आम सहमति से अलग करता हूँ और यह मानता हू कि ईरान के खिलाफ युद्ध की संभावना अब ज्यादा बलवती है।
एन.आई.डी. की इस रिपोर्ट का सुप्रचारित मुख्य बिन्दु , जो इसकी पहली पंक्ति में ही है, कहता है “ हमारे हिसाब से ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को 2003 के शरद काल (सितम्बर के आसपास) में ही बंद कर दिया था। ” कई सारे दूसरे समीक्षकों ने, जिसमें जान बोल्टन पैट्रिक कलाउसन, पैलेरी लिंसी और गैरी मिल्होलीन , कैरोलीन ग्लिफ, क्लाउडिया रोसेड , माइकेल रूबिन और जेराल्ड स्टेनबर्ग शामिल हैं ने पहले ही कुशलता पूर्वक इस काल्पनिक , राजनीतिक रंग में रंगी, और शर्मनाक रूप से दिग्भ्रमति रिपोर्ट की गहरी चीड़-फाड़ कर डाली है और इसे एक भ्रामक प्रचार के रूप में झुठला दिया है।
अत: मैं दुबारा उन्हीं बातों में पड़ना नही चाहता। साथ ही अमेरिकी कांग्रेस के कई अग्रणी और सम्मानित सदस्य इस रिपोर्ट के निष्कर्षों से सहमत नहीं है फ्रांसीसी और जर्मन नेताओं ने इसे ठुकरा दिया है और नाटो की भी यही राय है। यहाँ तक कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी भी इसे शक की नजर से देखती है। ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसियां यह मानती है कि उनके अमेरिकी सहयोगी धोखा खा गये हैं। वही इजरायली गुप्तचर संस्थाओं ने इस रिपोर्ट पर आश्चर्य और निराशा जताई है ।
खैर हम आगे बढ़ते है और यह जानने का प्रयास करते हैं कि इस 2007 की ताजा तरीन रिपोर्ट का दीर्घकालिक परिणाम क्या हो सकता है –
चलिए विचार के तौर पर मान लेते हैं कि मई 2003 में एन.आई.ए की वह रिपोर्ट सही थी जिसमें 16 विभिन्न अमेरिकी एजेंसियों ने दावे के साथ यह कह दिया कि उनहें पूरा विश्वास है कि ईरान इस समय अपने परमाणविक कार्यक्रम को विकसित करने के लिए कटिबद्ध है। हम यह भी मान लेते हैं कि ईरान के इस परमाणविक प्रचार के प्रति अमेरिका की तीन तरह से प्रतिक्रिया हो सकती है।
1-ईरानियों को यह समझाना की वे स्वत: ही अपना परमाणु क्रायक्रम रोक दे।
2-इसे सैनिक हस्तक्षेप द्वारा रोका जाए (यहाँ यह जरूरी नहीं है कि सीधे ही उनके नाभिकीय संयंत्रों पर हमला कर दिया जाए । कई अप्रत्यक्ष तरीके भी जैसे कि ईरान में संशोधित पेट्रोकेमिकल के आगमन पर रोक लगाना आदि )
3-ईरान को उसे परमाणु कार्यक्रम को बम बनाने की परिणति तक पहुँचने दिया जाए।
जहां तक की तीसरे विकल्प की बात है राष्ट्रपति पहले ही कह चुके हैं कि जो भी तीसरे विश्व युद्ध को टालना चाहता है , उसे ईरानियो की परमाणविक क्षमता परमाणु अस्त्र बनाने तक के पहले ही रोकना होगा। अब तक इस एन.आई.ए कि रिपोर्ट ने तो उन पर कोई असर नहीं दिखाया है। वे जान मैक्कैन के इस मत के साथ ही दिखते हैं कि अमेरिका के सैनिक हस्तक्षेप से ज्यादा बुरी एक ही बात हो सकती है और वह परमाणु शक्ति सम्पन्न ईरान ।
अत: सवाल यह नहीं है ईरान को रोका जाए या नही, असल सवाल है कैसे ?
2007 की इस एन.आई.ई रिपोर्ट ने ईरानियो द्वारा स्वत: ही इस परमाणु कार्यक्रम को रोकने वाले विकल्प का मार्ग ही बंद कर दिया है क्योंकि इसके लिए एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय समझौते की जरूरत है। जब कई महत्वपूर्ण देशों ने साथ मिलकर संयुक्त सुरक्षा परिषद के प्रताव संख्या 1737 को दिसम्बर 2007 में पारित किया था तो इसने ईरानी नेतृत्व को सावधानी पूर्वक और डर का काम करने पर मजबूर दिया था। पर एन. आई ए की इस संतोषजनक रिपोर्ट ने विस्तृत सहयोग और दबाव की राजनीति को शिथिल कर दिया है। अब जब वाशिंगटन कुछ अन्य पश्चिमो राष्ट्रो, रूस और चीन से दबाब बनाने का आग्रह करेगा तो वे इसी रिपोर्ट का हवाला देकर सहयोग से इंकार कर सकते है। इससे खराब बात यह है इस रिपोर्ट ने कयामती मानसिकता वाले ईरानी नेतृत्व को यह संकेत दिया है कि अब बाहरी प्रतिबंधो की चिंता न करे और निश्चित होकर अपने बम बनाने के कार्यक्रम को पूरा करे।
अब बचता है,विकल्प नम्बर दो , यानि की एक तरह का सीधा हस्तक्षेप। पर अब ये कुछ अनिश्चित सा लगता है, खासकर तब जब एन.आई.ए की रिपोर्ट ने सनसनी सी पैदा कर दी है और पूरे बहस का रूख ही मोड़ दिया है पर सवाल यह है कि क्या यह हजार शब्दों वाली रिपोर्ट – जिसकी जमकर आलोचना हुई है – ईरान के मामले में अमेरिकी रूख में खास बदलाव ला पायेगी ? क्या यह जार्ज बुश का दिमाग बदल पाएगी ? क्या इसका प्रभाव एक साल बाद भी बना रहेगा ? या इसका प्रभाव आगे भी होगा या कहें अगला राष्ट्रपति भी इसे मानेगा।
ये शायद मुमकिन नहीं है कि ये संभावनाएँ हकीकत का रूप लें कि यह रिपोर्ट बाकी सभी को झुठला देगी कि अब ईरान के संदर्भ में आगे और कोई प्रगति नहीं होगी कि ईरान के नाभकीय महत्वाकांक्षाओं पर अब पूर्णविराम लग जाएगा और दिसम्बर 2005 के बाद यह अध्याय बंद हो जाएगा। यह बहस निश्चित तौर से आगे भी चलती – बदलती रहेगी और शायद एन.आई.ए की यह रिपोर्ट भी कई अन्य अमेरिकी अथवा गैर अमेरिकी संस्थाओं द्वारा की गयी अधिकारिक अथवा अनधिकारिक तकनीकी अथवा गैर तकनीकी समीक्षाओं में से एक बनकर रह जाएगी।
संक्षेप में कहें तो , विकल्प नम्बर एक के पतन और विकल्प नम्बर तीन की अस्वीकार्यता के मध्य विकल्प नम्बर दो – अमेरिकी अथवा ईजरायली सेनाओं द्वारा युद्ध की कार्यवाही – एक ज्यादा मजबूत विकल्प नजर आता है इस तरह एक अदूरदर्शी , संकुचित सोच वाली और साफ तौर पर पक्षपाती खुफिया नौकरशाही ने अप्रिय वास्तविकताओं को छुपाने के प्रयास में एक भयानक दु:स्वरूप को जन्म दे दिया है ।
सम्बन्धित विषय: अमेरिका की विदेश नीति, ईरान
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