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तुष्टीकरण और यूरोप की झिझक

द्वारा डैनियल पाइप्स
न्यूयार्क पोस्ट
28 जनवरी, 2003

मौलिक अंग्रेजी सामग्री: [Appeasement and] Why Europe Balks
हिन्दी अनुवाद - अमिताभ त्रिपाठी

पिछले सप्ताह फ्रांस के अग्रणी राजनेताओं ने कुछ महत्वपूर्ण पराजित मानसिकता की बातें कहीं। इराक के विरूद्ध किसी सैन्य अभियान को निरस्त करते हुए राष्ट्रपति जैक्स शिराक ने कहा, “युद्ध सदैव पराजय को स्वीकार करना है और सबसे बुरा समाधान है। और इसलिए इससे बचने का हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए ’’। विदेशी मन्त्री डोमीनिक डि विलेपिन ने इसे और स्पष्ट शब्दों में कहा, “सैन् अभियान को किसी भी प्रकार न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता ’’।इन सभी को जर्मनी के चान्सलर का भी समर्थन मिला।

इसकी प्रतिक्रिया में अमेरिका के रक्षा सचिव डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने फ्रांस और जर्मनी को

‘ पुराना यूरोप ’ बताकर अस्वीकार कर दिया। पोस्ट ने उन्हें ‘ छोटे स्तनधारी मांसाहारियों की धुरी ’ बताया तो कार्टूनिस्ट टोनी अथ उनका चित्रण ‘ नाराजगी की धुरी’ के रूप में किया। तुष्टीकरण एक अपमान के रूप में ध्वनित होता है परन्तु यह लम्बे इतिहास के साथ एक गम्भीर नीति है तथा ऐसी शाश्वत अपील है जो आज की परिस्थितियों में भी काफी प्रासंगिक है।

येल इतिहासकार पाल केनेडी ने तुष्टीकरण की परिभाषा “ झगड़ों को निपटाने के एक रास्ते के रूप में की है जहाँ लोगों को तार्किक बाचीत और समझौते के द्वारा शिकायतों को सन्तुष्ट कर मंहगे, खून खराबे युक्त और सम्भवत: काफी भयानक सशस्त्र संघर्ष को बचाया जाता है।’’ ब्रिटिश साम्राज्य ने 1860 से इस तुष्टीकरण को अपनाया जिसके अच्छे परिणाम हुए तथा मंहगे औपनिवेशिक संघर्षों को बचाते हुए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी यथा स्थित बनाने में सफल रहे। कुछ हद तक अन्य यूरोपीय सरकरों ने भी यही नीति अपनाई।

उसके बाद 1914 आया जब अब्यवस्था की स्थिति में यूरोप ने तुष्टीकरण को छोड़कर प्रथम विश्व युद्ध की ओर दौड़ लगाई जिसे येल इतिहासकार पीटर ग्रे ने ‘ धार्मिक अनुभव की लगन बताया है। इस महाद्वीप को युद्ध की यन्त्रणा झेले एक शताब्दी बीत चुकी है उसकी स्मृतियों नष्ट हो टुकी हैं। इससे भी बुरा यह की जर्मन चिन्तक फ्रेडरिक नीत्शे ने तो युद्ध के महिमामण्डन की अवधारणा विकसित की है।

1914 – 1918 के चार वर्षों के नरक के बाद विशेष रूप सें उत्तरी फ्रांस की खाइयों में 1914 के सम्बन्ध में महिमामण्डित करने के प्रति अपराध भाव जागा। एक नई सर्वानुमति उभरी। दुबारा कभी यूरोप युद्ध की ओर नहीं भागेगा। तुष्टीकरण पहले से बेहतर लगने लगी। और इसलिए 1930 में जब एडोल्फ हिटलर ने धमकाया तो ब्रिटेन और फ्रांस के नेताओं ने उसे अपनी ओर करने का प्रयास किया। निश्चित रूप से जिस रणनीति ने औपनिवेशिक युद्ध में साथ दिया था वहीं नाजियों के साथ घातक रही है।

इससे पूरी तरह नाम खराब कर चुके अधिनायकवादियों को अपनी ओर करने की नीति चल पड़ी। शीत युद्ध के पूरे समय में ऐसा लगा कि यूरोपवासियों ने ऐसी शिक्षा ली है जिसे वे कभी नहीं भूलेगें। परन्तु 1991 में सोवियत संघ के पतन के उपरान्त वे भूल गये।

वीकली स्टैण्डर्ड के एक मेघावी निबन्ध में येल के डेविड गेलेन्टर ने इसकी ब्याख्या की है कि कैसे यह घटित हुआ । “द्वितीय विश्व युद्ध और शीत युद्ध के दौरान तुष्टीकरण की शक्ति अस्थाई तौर पर छुप गई थी परन्तु समय बीतने के साथ द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव नष्ट हो गया जबकि प्रथम विश्व युद्ध का शाश्वत रहा ’’।

ऐसा क्यों ? गेलेन्टर के अनुसार प्रथम विश्व युद्ध द्वितीय की अपेक्षा अधिक व्यापक था जो कि मस्तिष्क को ग्रहण करने के लिए भी बड़ा था। राजनीतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी इसका प्रभाव हुआ जबकि ऐसा लगा कि मानों द्वितीय वश्व युद्ध हुआ ही नहीं।

गेलेन्टर का तर्क है कि वास्तव में 1920 का समय फिर से है और उसी युग की भाँति अधिनायकवादी तानाशाहों के तुष्टीकरण की तैयारी है।

उन्होंने अन्य कारणों से भी इसे 1920 के यूरोप के समान पाया है। “ आत्म दृढ़ता के प्रति इसका प्रेम , तथा साम्रान्यवाद और युद्ध के प्रति उपेक्षा, उदारवादी जर्मनी , सिमटता रूस तथा छोटे राज्यों से घिरा यूरोप का मानचित्र के साथ यूरोप के प्रति अमेरिका का तटस्थ भाव और अमेरिका से यूरोप का कोई मतलब न रखना। इसके साथ ही यूरोप का सेमेटिक विरोध और मुस्लिम राज्यों को राजनीतिक , आर्थिक ढंग से पुरस्कृत करने की प्रवृत्ति के साथ आत्म घृणा और अपराध बोध ’’

गेलेन्टर का प्रस्ताव है कि 1920 की शैली की आत्म घृणा यूरोप में सशक्त शक्ति है। और इस विचार के लिए तुष्टीकरण सर्वाधिक उपयुक्त है , क्योंकि वे दशकों से ऐसी वैश्विक दृष्टि में पले हैं “ जो पश्चिमी ब्यक्ति के रक्त से अपराधी , नैतिक दीवालियापन तथा अपने मूल्यों को दूसरों पर थोपने के पश्चिमी संस्कृति का आक्रोशित कर देना वाला व्यवहार मानता है।इससे हम ‘ पुराने यूरोप ’ के सद्दाम हुसैन से संघर्ष करने की अनिच्छा पर आते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की शिक्षा ( अत्याचारी के शक्ति तैयैर करने से पूर्व ही उस पर हमला ) 20 के दशक के व्यवहार में खो गई है ( किसी भी प्रकार सैन्य कार्रवाई न्यायसंगत नहीं हो सकती )

आत्म घृणा की यह कमजोरी द्वितीय विश्व युद्ध की भाँति ही विनाशकारी की ओर ले जायेगी। अमेरिका तुष्टीकरण के लोभ से परे लोकतन्त्र का नेतृत्व कर रहा है। इराक आरम्भ करने का अच्छा स्थान है।

सम्बन्धित विषय:  अमेरिका की विदेश नीति, इतिहास डैनियल पाइप्स की साप्ताहिक हिन्दी ई-मेल सूची के नि:शुल्क सदस्य बनें